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कारीगर

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विभु पांडे

"छोटी छोटी बात पे इतना खीजिया क्यूँ जा रहे है आजकल!" आयशा ने कटे हुये प्याज़ खाने की प्लेट में परोसते हुये बोला, "कल भी आप शानू पे इतना भड़क गये थे।"

यूसुफ ने कोई जवाब नहीं दिया। भले ही उसने प्याज़ अलग से मंगवाया था, प्याज़ होने या न होने से खाने के ज़ायके में उसे कोई ख़ास फ़र्क महसूस नहीं हुआ था।

"आज थोड़ा जल्दी दुकान निकलना है, एक नयी मशीन उतरवानी है," यूसुफ ने ऊँची आवाज़ में बोला ताकि आवाज़ रसोई तक पहुँचे। उसने कोशिश ज़रूर की, कि आवाज़ में बिल्कुल गुस्सा न झलके।

थोड़ा गुस्सा उसके मन में अभी भी था। थोड़ा गुस्सा उसके मन में कुछ समय से निरंतर ही था।

"चलिए! एक और मशीन आ जाएगी तो आपका काम थोड़ा और आसान हो जाएगा," आयशा ने थोड़ा उत्साह भरते हुये बोला।

यूसुफ हल्का मुस्कुराया पर इस बात पे भी उसने कुछ जवाब नहीं दिया। आयशा की समझ से परे था कि यूसुफ को आख़िर क्या बात खटक रही है। अभी भी यूसुफ आयशा से हर छोटी से छोटी बातें साँझा करता, यूसुफ को आयशा से सलाह लेने में बिल्कुल झिझक नहीं थी, भले ही वह उससे ज़्यादा पढ़ी लिखी थी। आयशा को फ़ख्र अपने पति की बढ़ोतरी पे भी था, जिसने शुरुआत एक मामूली से कारीगर के भाँति की थी। आयशा अपने भाव सामान्यतः कम व्यक्त करती पर अपने मायके वालों को यूसुफ की तरक्की बड़े चाव से बताती, "अब तो पूरा कारखाना यही देखते है।"

आयशा का अपने पति पर नाज़ करना लाज़मी भी था, यूसुफ की अपने काम पे पकड़ जो इतनी अच्छी थी। उसकी उँगलियों को इतने बारीख़ पैटर्न याद हो चुके थे जो शायद उसकी आँखें साड़ी पे कढ़ाई उतरने के बाद ही समझती।

अक्सर वह अपने काम में बिल्कुल मग्न हो जाता था, "चाय अभी उस कोने में रख दो, 5 मिनट में लेते है," और यूँ ही शाम वाली चाय झंझड़ के पास रखे-रखे ठंडी हो जाती, मानो समय एक चुटकी में संगीत सुनते सुनते बीत गया, दूसरों को भले वह आवाज़ हैंडलूम का खटखटाना लगे। बनारसी साड़ी के व्यापारी भी उसकी कारीगरी की सटीकता की 4 टका मार्जिन के रूप में पुष्टि करते थे। उसकी कारीगरी का असली प्रमाण उस दुल्हन की प्रशंसा से होती जो उसकी बारीक़ काम की कायल तो थी पर उसका नाम तक नहीं जानती थी।

ख़ैर, उस समय तो ज़ीशान सरकारी स्कूल जाता था। अब उसके पापा हैंडलूम का संचालन नहीं, पावरलूम और रैपियर जैसे मशीनों का संचालन देखते थे। जो छोटे मोटे सपने आयशा और यूसुफ ने साथ में देखे... ज़ीशान को इंग्लिश मीडियम से पढ़ाने से लेकर जर्जर घर को दो मंज़िला इमारत बनाने तक, यूसुफ के चरित्र और लगन के ज़रिये सब समय से पहले ही पूरे हो गये।

रैपियर इंस्टॉल करते समय जब टेस्ट करने की बारी आयी, पावरलूम और रैपियर का लोड शायद साथ में कारखाने हैंडल नहीं कर पाया। एक मैकेनिक ने बोला, "लोहटा मार्केट से एक ठो इलेक्ट्रिशियन बुलवाये के पड़ी।"

कारखाने में अचानक से घनघोर सन्नाटा छा गया। रोशनदान में बने आकारों से होती हुयी सूरज की किरणें धूल को इकट्ठा करती हुयी दीवार के सहारे खड़े हैंडलूम पे जा गिरी। यूसुफ की नज़र जब धूल खाते हैंडलूम पे पड़ी, उसके चेहरे पे हल्की सी मुस्कान आयी।

बिजली आने में थोड़ा वक़्त लगना था, मशीन इंस्टॉल करने वाले तीनों मैकेनिक अपना शर्ट उठाते हुये कारखाने के आगे आँगन की तरफ़ चले।

"दुकान वाले से पार्ट्स का बिल माँग लेना," यूसुफ ने मैकेनिक को आहिस्ता से बोला और मानो उसके पाँव ख़ुद-ब-ख़ुद उस हैंडलूम की ओर बढ़ने लगे।

भले ही हैंडलूम से किया घंटों का काम लाइट आने पे तुरंत हो जाता, यूसुफ को मानो एक बहाना सा मिल गया। उसने हैंडलूम से धूल की हल्की परत कपड़े से झाड़ी और बचा हुआ बूटा हैंडलूम पे लगा दिया।

हैंडलूम पे हाथ फेरते ही उसके कौशल उँगलियों को वह पुरानी लय याद आने लगी, जिन पैटर्न का उसे पूरा विश्वास था कि उसका दिमाग़ भूल चुका होगा।

रैपियर को ऑपरेटर चाहिए था, पर शायद यूसुफ को हैंडलूम।

एक आध घंटे बाद जब लाइट आ गयी, वह अपनी जगह से हिला तक नहीं। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे उस दिन हैंडलूम पर साड़ी नहीं, यूसुफ का खोया हुआ हिस्सा बुन रहा हो।

अब तो शाम ढल चुकी थी, यूसुफ ने कारखाने का बड़ा ताला बंद किया। रैपियर मशीन की लगातार चलती धुन पीछे छूट गयी थी। रास्ते भर उसने यह नहीं सोचा कि आज कितना प्रोडक्शन हुआ, कितना ऑर्डर बाकी है।

खाने में आज भी वही सब्ज़ी थी, वही रोटी।

"गिन के मत खाया करो शानू," आयशा ज़ीशान की थाली में रोटी रखते हुये बोलती।

यूसुफ ने एक निवाला तोड़कर सब्ज़ी के साथ खाया और फिर बिल्कुल साधारण सी आवाज़ में बोला, "खाना बहुत टेस्टी बना है।"

आयशा का हाथ वहीं थम गया। उसने यूसुफ की तरफ़ देखा। यूसुफ भी उसी की तरफ़ देख रहा था, उसके नज़रों में पुरानी गर्मजोशी थी।

ज़ीशान फिर अपनी स्कूल की कोई बात बताने लगा, ".. ऊपर से सर ने बोल दिया कि जिसने मोबाइल या कंप्यूटर से होमवर्क किया, उसका ज़ीरो।"

पहले यूसुफ मुस्कुराया, फिर आयशा।